१)...साथी ,
जिस उमर में तुम हमारे लिए फंदा चूम रहे थे...
उस उमर में
हम डेनिम जींस के लिये शो रूम की चौखट चूम रहे थे ...
लेकिन उससे भी बड़ा पछतावा यह है कि
हमने तुम्हारी शहादत को ‘पतुरिया’ बना दिया ..|
चूहों ने तुम्हारे नाम से ‘बिल’ बना लिये...
खेत ,खलिहान, नदी , जंगल , मैदान
सब खंखोल कर बेशर्मी का स्वर्ग बना डाला...
और स्वर्ग की चाभी को तिलस्मी खोह में छुपा दिया |
साथी ,
उस चाभी तक पहुँचने के लिये हम बारहा
तुम्हारी आत्मा को बूटों से रौंदते हैं |
....सुनो इसके पहले कि
हमारी जवानी शर्म से गल जाये
अपने हिस्से की थोड़ी अंगड़ाई हमें भी दे दो
कि हम कम अस कम करवट तो बदल लें |( पिछले २३ मार्च की पोस्ट पुन:)
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२)
तुमने कहा था ..
" क्रान्ति की धार विचारों की सान पर तेज़ होती है "
साथी .........
तुम्हारे बाद ,तुम्ह्रारे नाम को उछालते हुए ,
कुछ बहुरूपिये बस्ती में घुसे
और 'विचारों की सान' को 'सत्ता की सान' से बदल दिया |
इस पर घिसी हुई 'क्रान्ति'
या तो राजधानी पहुँचकर कोठे की दल्ला हो गयी
या फिर जंगल पहुंचकर ,
अपनी ही बारूदी सुरंग में फंसकर अंधी |||
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